• rangkarmi_anuj 10w

    खूँटा

    वो गाँव की
    औरत जो कभी बच्ची थी
    अब उसकी बच्ची है,
    वो कम उम्र में बूढ़ी हो गई
    और उसकी जवानी ने
    ससुराल की दहलीज़ पर दम तोड़ दिया,
    हाथ उसके खुरदुरे हैं
    उसपर परत जमी हैं
    गेरू और गोबर की
    घर लीपते लीपते लकीरें मिट गईं
    साथ में उसका नसीब वक़्त की तरह
    गायब हो गया।

    उसके घर पर
    एक खाली खूँटा गड़ा है
    जिसमे ज़ंजीर बंधी हुई है,
    ये ज़ंजीर उसकी गाय की थी
    जो उसके मायके से गऊदान में दी गई
    थी जो मर चुकी है क्योंकि वो मायके पक्ष
    की गाय थी इसलिए उसका भरपूर इस्तेमाल किया
    और उसे चारा के नाम पर लाठी मिली और
    ममता के नाम पर मरे बच्चे जो
    भूख से मर जाते थे, उस मरी गाय को
    भी बेचा गया उसका दाम भी लिया गया
    जिससे घर में आया नया हल।

    वो औरत
    सांसों को जाने के लिए कहती है,
    उसे घूँघट में सांस लेने में दिक्कत होती है,
    घूँघट उसका फांसी फंदा है
    जो रोज़ रस्सी पर सूखता है,
    और रात को उस औरत का
    सिंदूर जबरजस्ती उसे खींचता है,
    उसके पेट में तीसरी सन्तान है
    जो दर्द सहती है जैसे सहन किये उसके
    बड़ों ने जो तीन और एक साल के हैं,
    इसलिए खामोश सब सह गए
    पेट के बच्चे को आदत हो गई है।

    पर रात को वो औरत
    चुपके से घर के औसार में जाती है रोज़
    जहाँ पर खाली खूँटा लगा है ज़ंजीर के साथ,
    वो मौन होकर उसे देखती है
    ज़ंजीर को गले मे डाल कर
    हाथ को ज़मीन में रख कर
    घुटनो के बल बैठ कर
    सांसों को भर कर
    गर्दन को झुका कर
    ज़ंजीर को जकड़ कर
    जोर से चिल्लाती है और कहती
    है, हे परम् पिता परमेश्वर
    तू मुझे आदमी बना दे
    और घर के अंदर जो आदमी है उसे
    गाय बना दे, पता तो चले खूँटा और ज़ंजीर
    औसार में नहीं उस घर में भी गड़ा है।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj