• gunjit_jain 11w

    बस आज का हो गया��शायरी पढ़ते पढ़ते भी जान नहीं छोड़ती, एक आध आ ही जाती है��

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    रास्तों पर चल रहे नाशाद मसलों की तरह
    हूँ ज़रा सा मैं अधूरा चंद मतलों की तरह।
    ©गुंजित जैन