• yusuf_meester 13w

    वो देख ले इक नजर, तो इनायत समझता हूँ
    उनकी बेरुखी को भी मुहब्बत समझता हूँ

    इश्क़ में मेरी मुफ़लिसी तो ज़रा देखो या...रों
    नफ़रत भरी बोल को ही ग़नीमत समझता हूँ

    दिल क्या कम था जो जुबां भी मुरीद हो गई
    हद है ! ज़िक्र-ए-यार को इबादत समझता हूँ

    ऐसा नहीं है कि करीब नहीं जा सकता मैं
    बस, इस मासूमियत को इज्ज़त समझता हूँ

    जब भी कभी, निगाहें फेर लेती है वो मुझसे
    इसे उनकी ज़ाहिर -ए- शिकायत समझता हूँ

    जाने क्यों दिलचस्पी आ गई इस मुहब्बत पे
    इनकी हर अदा को अब आफ़त समझता हूँ

    ©यूसुफ़ मिस्टर