• succhiii 7w

    मीटर - 122 122 122 122
    पैहम -निरंतर
    पैकर -साक्षात
    बहम-साथ
    ख़म - टेढ़ापन

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    ग़ज़ल

    ख़ुशी की ख़ुशी कोई ग़म का न ग़म है ।
    न जाने ये क्यूँ आज फिर ,आँख नम है ।

    जिधर देखिए दश्ते-सहरा ही सहरा …
    कि अहले सफ़र में यहाँ ,ख़म ही ख़म है ।

    ज़माने तिरे चंद ख़ुशियों के सदक़े ….
    किये जीस्त पे हमने ,पैहम सितम है ।

    नहीं जो तू पैकर मेरे रूबरू है ..
    ख़यालों में मेरे सदा ही बहम है ।

    तेरे चाहतों के दयारो में यक्सर ..
    फ़क़त हमने देखें ,भरम ही भरम है ।

    अधूरे से कुछ ख़्वाब , हैं चंद यादें..
    यही हमने जोड़ी थी , बरसो रक़म है ।

    है दिल की फ़क़ीरी , कलम आशिक़ी है ..
    मुझे क्या कमी है , करम ही करम है ।
    @succhiii