• anshuman_mishra 7w

    2122 2122 2122 212

    शमशीर - तलवार शज़र - पेड़ कल्ब - दिल

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    ग़ज़ल

    अश्क की कल बारिशें थीं, आज फिर बादल दिखे,
    आज फिर से खत पुराने, धूल से घायल दिखे,

    थी पड़ीं कुछ स्याह बूंदें डायरी के पेज पर,
    आज फिर से गाल तक फैले हुए काजल दिखे!

    फेंक शमशीरें उठाते फूल अपने हाथ में,
    इश्क से थी जंग जिनकी, इश्क में पागल दिखे!

    आज कटते इस शज़र की चीख सुन पाते नहीं,
    खुदकुशी करते परिंदे इसलिए थे कल दिखे!

    आस गायब, कल्ब गायब, ज़हन गायब है मगर
    बाद में ढूंढेंगे सब, पहले ज़रा बोतल दिखे..

    _अंशुमान_मिश्र__