• _athazaz 102w

    Tried a ग़ज़ल for the first time.

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    ग़ज़ल

    तेरी यादों पे खुदको कुछ यूँ क़ुर्बान किया
    कि हर उल्फत को मैंने यारी का नाम दिया।

    तुझसे दूर भी मैं रह सकता हूँ खुश
    तेरे इस झूठ को भी मैंने सच का आयाम दिया।

    अपने जनाजे़ पे भी रहा ख़फ़ा कुछ यूँ
    कि आँखें मूँदें भी तुझे मुस्कुराकर ही सलाम दिया।

    ना इक अश्क भी तू मेरे कफ़्न पे टपकाना
    कि है सबसे छुपा के तुझे हर खत में बेनाम लिखा।

    रो रो कर ना करूंगा मैं अपने ज़ख्मों को मशहूर
    मैं अतजाज़ नहीं,अगर अब कभी तुम्हारा नाम लिया।
    ©_athazaz(Animesh kumar)