• tengoku 31w

    कभी कभी हमारी आँखें घर की चौखट पर बैठकर घर की याद में रिस दिया करती हैं। आंसू से तर हुई हथेली अपनी मुठ्ठी में उस घर की महक को भरने में नाकाम हो जाती है। आखिर घर महकता कैसा था? ये सवाल दिमाग में आते ही, आम सी महकती उस कमीज़ की खुशबू इर्द गिर्द मंडराने लगती है। गर्मी की उस जलती हुई दोपहर में, जब सब सो जाया करते थे तब बिस्तर के नीचे बिछे आम के ढेर में से सबसे पका हुआ आम चुना जाता था, दोपहर की दावत के लिए। फिर घर के सबसे शांत कोने में किसी पुराने पेपर पर बैठकर, कमीज़ के पीला हो जाने तक आम खाया जाता था। रात को मां से चिपककर सोते वक़्त, माँ आम महक लेती थी और फिर अगली सुबह बाबूजी दो किलो और लाकर ठीक उसी जगह रख दिया करते थे।

    ये दीवारों की दरारें कितने किस्से और ये छत की सीलन कितनी बरसाते अपने भीतर छुपाए रहती हैं। दिल करता है किसी कागज़ की कश्ती पर बैठकर उन्हीं बरसातों में वापस लौट जाए जहाँ संसार की सारी खुशी एक पानी से भरे गड्ढे में समाई होती थी। बरसात के मेंढ़क को उछलता देखकर ना जाने कौनसा सुख मिलता था। कभी मोर का पंख तो कभी डेयरी मिल्क का सुनहरे रैपर किसी किताब के बीच दबा मिलता है तो लगता है, खुशी की परिभाषा पहले कितनी महीन हुआ करती थी।

    ठंड हमें आधी माँ की शॉल सी और आधी आग पर भुने हुए आलू मटर सी महकती नज़र आती है। स्कूल से आते वक़्त ठंडी हवा अपनी मुट्ठी में भरे लिया करते थे और घर आकर माँ के गालों पर सारा गुलाबी रंग उड़ेलकर दौड़ जाते थे। फिर वह मेरे पीछे भाग पड़ती थी और उसकी खिलखिलाहट की आवाज़ में हमारा घर हो जाता था।

    कहाँ गया वह घर? कितना रोने पर उसकी ओझल हुई तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी? क्या कभी वापस उस घर का आना, इस चारदीवारी में हो पाएगा? इन सवालों के साथ गालों पर चिपकी आंसू को निसहाय हथेलियों से पोछ दिया करते हैं। उन दिनों सा महकता था घर हमारा। वह महक अब किसी पल में नहीं रही।




    -अनन्या