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    मैं कश्मीरी पंडित

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    कश्मीरी पंडित

    जो था स्वर्ग में बसता वो ब्राह्मण मैं
    ईश्वर अल्लाह रखता जो मन में है
    घर की याद सताती जिसे हर क्षण में है
    अपनी बस्ती छोड़ वनवास करता रावण मैं।

    हुआ किस्सा ये नब्बे की घुप सी रातों में
    वो दिन है बहता आज भी मेरी आँखों से
    थी बस्ती जली, था खून बहा
    मेरे अपने मरे मेरी बाहों में।

    वो कहते थे है राम नहीं,
    वहाँ बैठा है बस एक अली
    उन अंधों को है पता नहीं
    उन दोनों की है यारी बड़ी।

    सो जब जब यहाँ नीचे दंगे होते है
    हम तुम जब बस खून के अंधे होते है
    ईश्वर अल्लाह दोनों ही शर्मिंदा होते है
    आपस में लिपट,
    दोनों भू भू करके रोते है।

    है ख्वाब मेरे बड़े छोटे से
    हम मिलके फिर से एक बने
    उस वादी में लूँ साँस मैं फिर से
    हो एक मंदिर मेरा, तेरी मस्जिद के पीछे।
    ©_athazaz