• purujit_kothari 31w

    || शाम ||

    एक शाम की ललक है मुझे
    एक शाम जो मेरे घर की छत से दूर हो!

    जब सूरज अपने घर को चला हो,
    आसमां में एक लाली सी छायी हो,
    पंछी उस शाम की लालिमा में,
    लाल होने को दौड़ रहें हों।
    सामने हो समंदर का एक किनारा
    मिट्टी की सौंधी सी खुशबू,
    जहां लहरें किनारों से टकरा कर
    उन ठंडी हवाओं के साथ
    जैसे कोई राग गा रही हो,
    और नज़दीक बैठी हो तुम।

    तुम हर पल हाथों से चेहरे पर आती जुल्फें हटाती,
    अगले पल फिर वो हवाएं उन्हें वहीं ले आती!

    उन हवाओं और जुल्फ़ों की कश्मकश की ललक है मुझे!

    ©purujit_kothari