• kashtandon 16w

    Ashiyana

    बरसों से सुखी ये चार दीवार के रंग
    आज खिल खिला उठे हैं।

    अरसो बाद लगता है यहा
    कोई आने वाला है।

    उम्र कैद थी लम्हों की कवायद में।
    आज मन खिल खिला उठा है
    किसी की आने की आहट में।

    अकसर एक अपनो की तपिश मन में सिसकती रही।
    खयाल धुआं बन निकला आसमान छूने।

    आज तो अंबर भी खुश है।
    झूम रहा सारा जग।
    खिल गए है मोर के पंख।

    अब तो बस खुशबू है सासों में
    देख कर ये चार दिवारी के नए रंग।
    ©kashtandon