• rasiika 68w

    @iamankyt
    आपकी एक रचना को पढ़कर ये लिखनेका मन हुआ :)
    शायद कुछ लफ्ज़ भी आपकी नज्मों से मिलते जुलते हो ..
    आपकी लिखावट जितना खुबसूरत ना सही
    उससे प्रेरीत होकर कुछ लिखने की कोशिश समझ लीजिए..
    आपका बहुत शुक्रीया ��

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    पूछते हो हसरते मेरी अब क्या ही बताऊ तुम्हे
    यकीन मानो मिजाज़ मेरा शायराना ही ठीक है |

    रखती हूं हसरत सूनाने की, सुनना ना चाहे लेकिन कोई तो
    ऐसी ग़ज़ल को लिखकर फिर काग़ज को छुपाना ही ठीक है |

    मिल भी गए तुम अब तो कहेंगे क्या तुमसे
    तुम्हारा वो मसरूफि़यत का बहाना ही ठीक है |

    क्या पता तेरी गली मे अब आऊ ना आऊ कभी
    रहने को मेरे ये जमाना ही ठीक है |

    बना ले जो महबूब को मज़हब भी खुदा भी
    खुदा से फिर जरा खौ़फ खाना ही ठीक है |

    लड़ जाए जो कोई खुदा तक से इस कदर
    वफा़ओ को उसकी फिर ना आजमाना ही ठीक है |

    बस चले मेरा तुमसे नजर तक ना हटाऊ
    जलसे मे तेरे मेरा ना होना ही ठीक है |

    ऐसे मे क्या कहे कही लडखडा गए कदम
    बैठने को मेरे फिर कोई मयखाना ही ठीक है |

    बात तेरी भी सही है, मचा दे जो तबाही
    ऐसी शमा को वक्त पर बुझाना ही ठीक है |

    रस्म-ए-उलफ़त को निभाना ही ठीक है
    मै करू इंतजार ; तेरा ना आना ही ठीक है |

    तसव्वुर मे मेरे और क्या क्या है क्या बताऊ
    छोडो किसी को कुछ ना बताना ही ठीक है |
    ©rasiika