• ashleywords 28w

    In the wake of the violences against the NorthEasterners and our constant struggle to be recognized as one of you, I think you have deliberately failed us as humans and then as Indians. Even after 74 years of Independence, we aren't truly free from our own prejudices. Ignorance has been playing a dominant role in leading people(from outside of Northeast) to a state where they at any given point of time and at any given cost refuse to recognize us as very much a part of India. This is indeed sad when our own people call us anything but Indians.


    �� कितना भारतीय दिखना काफी है? ��


    ख़ून का रंग कुछ और हो तो बता
    कोई खलिश हो तो जता
    हम ने भी यही लाल रंग बहाए
    ये मिट्टी हमें अपनाए तो सही।
    आंखें छोटी और दिल बड़ा
    हम पे भी वही रंग चड्ढा
    जिसे तुमने अपना मुल्क कहा
    हम ने भी उसे नफ्स दीया
    जब नदियां न करते बहने से इंकार
    तो क्यों हुए हम लोग शिकार
    कहने को तो एक अरसा हो गया आजादी को
    फिर भी रोये क्यों रूह हमारे
    क्या काफी नहीं सिमाओ में बैर
    की अब अपने लोगो पे उतर आऐ हम।
    क्या हक नहीं हमें खुद को भारतीय कहने का
    क्या हक नहीं हमें उसमें समाने का
    क्या कभी देखी हवाओं को कतराते हुए हमारे अंगल में बहने से
    क्या कभी किसी पांची ने हमारे आसमान में उड़न न भारी हो
    फिर क्यू ये मलाल, ये रंजीसे
    हमें भी भीगा जाति है यही बारिशे
    हमारे यहाँ भी महक उठती है मिट्टी
    देश प्रेम की कहानियों से।
    फिर क्यों प्यार के बदले प्यार नहीं
    पर खून से स्वागत होती हमारी
    क्यू आपने ने ही किया तिरस्कार
    जहां एक रोज हम ने भी दिया बलिदान
    देश तो हुई आज़ाद
    पर अफ़सोस लोग ना हो पाए रिहा।
    यहाँ भी मां ओ ने खोया है सपुत
    चाहे तो आप इतिहास उठाकर देखे सबुत
    हमें अफ्सोस है इस बात का
    की गेरों ​​में कहा दम
    हमें तो अपनो ने तोड़ा
    की नदियों में कहा दम
    हमें तो लोगो की सोच ने बाता।

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    हम तो युही बदनाम है
    इस मिट्टी के होते हुए भी जैसे बेनाम है
    शायद अलग दिखना उन्हे मंजुर नहीं
    और हम कुछ खास कर नहीं सकते
    अपने शकल का, अपने नाम का
    की कोई अलग कैसे दिखें
    तकी हम भी आपके जैसे लगे
    की हम कोई खाने की चीज नहीं इंसान लगे।
    अरे हमारी अंगरेजी में चुपी परदेसी को नहीं
    दिल में बसा हिंदुस्तानी को देखो
    हां कपडे शायद अलग हो
    पर संस्कार एक समान।
    हम अक्सर खुदको पुचा करते हैं
    कितना भारतीय दिखना काफी है यहां
    की आप हमें भारतीय समझो
    आंखें भले छोटी हो
    पर दिल की कोई सीमा नहीं
    आप चाहे लिखवा ले, उसी खून से
    जो आपका भी लाल और हमारा भी।
    आये किसी रोज हमें गाले लगाये
    हम से इश्क करे
    हम उसी शिद्दत से करेंगे मोहब्बत
    जिस शिद्दत से आप खुद को हिंदुस्तानी कहते हो।
    नाम में क्या रखा न चेहरे में
    पहनावे में क्या रखा न रिवाजो में
    रिश्ता तो दिल से दिल तक है
    वतन से इश्क का है
    जैसे नादियों का परबतों से है
    और लहरों का किनारो से।
    आप हम से हमरा हाल तो पुछिये
    हम आपसे वासता खुद बुन लेंगे।
    देश एक ही है पर भाषा अनेक
    आप भले हमारी न समझो और हम आपकी
    पर क्या प्रेम की परिभाषा कभी नहीं
    हमें जुरे रखने को।
    आप एक कदम बरहाए तो सही
    हम मिल जाएंगे जरूर कहीं।


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