• _relatable_asa_ 70w

    दबे पाँव, बंद मूट्ठी,
    बढा जहरीला खेल है,
    चूहे जो खिसकते नही,
    उनमे अपना ही मेल है।

    फूल जो खिलते नही,
    थोडा अपना सा एहसास है,
    फल जो फलते नही,
    उनमे अपना ही द्वेष है।

    सावन जो बरसता नही,
    उसमे भी कुछ खामियाँ है,
    नदीयाँ जो बहती नही,
    किसी का तो दोश है।

    अपने अपनों में ही झूलस रहे हैं,
    और बात करते हैं कायापालट की,
    गैरों में भी वक्त कहाँ,
    कुछ आप की, या फिर कुछ खुद की।

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