• raaj_kalam_ka 8w

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    क़र्ज़-ए-इश्क़

    मुफलिसी के दौर में, ग़म भी अमीर हो गया
    ख़ून बेच के भी चुका न सके क़र्ज़-ए-इश्क़ ।


    बदस्तूर बातें होती रही हमारी बेवफाई की
    नाकाबिल थे हम मिटा न सके मर्ज-ए-इश्क़ ।

    ©raaj_kalam_ka