• prashant_gazal 18w

    गीत (वतन)

    वतन से बिछड़कर वतन याद आया l
    गुलों से भरा वो चमन याद आया ll

    अरे यार ये हम कहां आ गये हैं l
    कहां छोड़ अपना जहां आ गये हैं ll
    न बोली, न भाषा, न त्योहार अपने,
    भला किसलिये हम यहां आ गये हैं ll
    पराई ज़मीं , आसमां भी पराया l
    वतन से बिछड़कर................ ll

    नए रास्ते हैं....नई मंजिलें हैं l
    मगर अब कहां वो‌ हसीं महफ़िलें है ll
    बदन‌ है यहां पर , ज़हन है वहां पर,
    सफ़र संग करती कई मुश्किलें हैं ll
    जहाँ हम थे मालिक, न कोई किराया l
    वतन से बिछड़कर................ ll

    जुदाई की रातें , जुदाई भरे दिन l
    घड़ी चल रही धड़कनें रोज गिन-गिन ll
    क़दम कब रखेंगे वतन की ज़मीं पर,
    हमें उस घड़ी की तमन्ना है पल-छिन ll
    मुकद्दर ने कमबख़्त क्या-क्या दिखाया l
    वतन से बिछड़कर................ ll

    ख़ुदा से दुआ रात-दिन मांगता है l
    'ग़ज़ल' सिर्फ़ अपना‌ वतन मांगता है ll
    जहां बाप, मां और भाई बहन हैं ,
    सनम और बेटी-मिलन मांगता है ll
    वही आशियाना, कभी जो बनाया l
    वतन से बिछड़कर................ ll

    वतन से बिछड़कर वतन याद आया l
    गुलों से भरा वो चमन याद आया ll

    ©prashant_gazal