• i_am_single 72w

    मैं लिखता हूं ।

    कभी हवाओं संग बेमतलब बतियाने को
    कभी दिल को बहलाने- फुसलाने को
    कभी यूं ही चह- चहाता हूं मैं पक्षियों के संग
    कल्पनाओं को जीने को.. मैं लिखता हूं ।

    कभी उसकी आंखों में देख मुस्कुराने को
    कभी बहुत पास उसे बुलाने को
    कभी भीगने को उस संग भीगी बरसातों में
    नजदीकियां जीने को ...मैं लिखता हूं।

    कभी देश पर मर मिट जाने को
    दुश्मनों का खून बहने को...
    वीरों की वीर गाथा सुनाने को
    शहादत को सलाम..... मैं लिखता हूं।

    कभी लिखता हूं अपनी परिस्थितियों पर
    सरकार की बदलती नीतियों पर ...
    कभी शब्दों के संग तुकबंदी निभाने को
    दिल-ए दास्तां ....मैं लिखता हूं।
    ©i_am_single