• happy_rupana 61w

    Note : Caption se padhna shuru kijiye.... ��

    Poem : हां....! मैं जिस्म बेचती हूं साहब...

    हां मेरा मोहल्ला बदनाम
    सबसे ज्यादा है इस शहर में
    और आपकी हवेली चर्चित
    अखबारों में भी होती है
    हां साहब मेरे घर के बाहर
    खामोशी की चीखें सुनती हैं अक्सर
    और आपके घर के बाहर
    भिखारियों की भीड़ लगी होती है
    हां....मेरी गली में आने वाला
    हर शख्स बदनाम हो जाता है
    पर आपका क्या
    आप तो आईना देखकर
    इंसानियत को भी शर्मसार कर जाते हो
    हां....! मैं जिस्म बेचती हूं साहब...
    पर आपका क्या...?
    जो आप हर रोज मेरे मोहल्ले में
    अपनी रूह को भी नीलाम कर जाते हो......!

    हां मुझे इंसान कहलाने का भी हक नहीं
    शैतान हूं मैं
    अपने जिस्म से आपकी भूख जो मिटाती हूं
    वह हैवान हूं मैं
    और आपकी इमानदारी के चर्चे
    हर घर में सुनाए जाते हैं
    समझा समझा कर बच्चे भी
    आपकी तरह बनवाए जाते हैं
    पर आपके चेहरे से नकाब हटा कर
    कोई ना पढ़ पाता है
    क्योंकि यहां तो पैसों के लिए
    भगवान को भी बेचा जाता है
    हम कलंक से ही अच्छे हैं
    और आप चांद की तरह भाते हो
    हां....! मैं जिस्म बेचती हूं साहब...
    पर आपका क्या...?
    जो आप हर रोज मेरे मोहल्ले में
    अपनी रूह को भी नीलाम कर जाते हो......!


    आप अपनी काली कमाई से
    अक्सर अखबारों को खरीद लेते हैं
    समाचारों को खरीद लेते हैं
    कभी कभी मुझे ऐसे
    लाचारों को भी खरीद लेते हैं
    पर हमारा जिस्म बिकाऊ है
    हमारी रूह नहीं
    हमारे हालात ही ऐसे थे
    हमारी जुह नहीं
    हालातों की दास्तान तो हमारी भी है
    पर सुनना आपका काम नहीं
    ज्यादा देर मत रुको साहब यहां पर
    वरना कल को आप भी हो जाएंगे बदनाम कहीं
    एक बात पूछूं....
    इस मोहल्ले में खामोशी की चीखों को सुनने के बाद
    आप कैसे सो जाते हो
    हां....! मैं जिस्म बेचती हूं साहब...
    पर आपका क्या...?
    जो आप हर रोज मेरे मोहल्ले में
    अपनी रूह को भी नीलाम कर जाते हो......!

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    मैं भी साहब आम लोगों की जैसी थी
    पर कुछ हालातों ने मुझे ऐसा बना दिया
    एक 16 बरस की लड़की को रेप करके
    कुछ शैतानों ने जिंदा लाश बना दिया
    सजा उनको भी हुई थी
    लेकिन पैसों के आगे तो हर कोई सजदा करता है
    हां कभी इंसान बिन मारे भी मर जाता है
    और कभी मर कर भी ना मरता है
    उस दिन के बाद
    घर से निकलना बंद हो गया था मेरा
    क्योंकि सब मुझे ही कसूरवार ठहराते थे
    कभी मेरे पापा को तो कभी मेरी मम्मा को
    गालियां देते और इतनी छूट क्यों दी अपने बच्चों को
    कभी-कभी यह भी सुनाते थे
    एक दिन लोगों से तंग आकर
    पापा और मम्मा ने जहर खा लिया
    बची थी मैं और मेरी छोटी बहन
    और इन लोगों ने हम दोनों को सड़क पर ला दिया
    नौकरी की तलाश में भटकती थी दिन रात में
    पर हर जगह से चरित्रहीन कह कर निकाल दिया जाता था
    मौत भी ना आ रही थी और
    जिंदा भी ना रहा जाता था
    तभी पेट पालने के लिए
    जिस्म को बेचना शुरू कर दिया
    जिंदा रहने के लिए
    पल-पल मरना शुरू कर दिया
    लाखों ही चीखें छुपी हैं इस मोहल्ले में
    जिसे हर रोज आप बदनाम कह जाते हो
    हां....! मैं जिस्म बेचती हूं साहब...
    पर आपका क्या...?
    जो आप हर रोज मेरे मोहल्ले में
    अपनी रूह को भी नीलाम कर जाते हो......!
    ©happy_rupana