• parle_g 15w

    मेरे जिहन में...ख़ालीपन चल रहा है.... कोई शेर... ढंग का नही निकल
    पा रहा कलम से... झेल लो...��

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird

    कुछ बादिल खयालात... से... लबरेज़ ग़ज़ल...��
    अच्छी न लगे तो... माफ़ी ��

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    ग़ज़ल ( रहती है )

    वज़्न - 2122 2122 2122 212

    अब हमारी जात का क्या वाइज बिलखती रहती है
    जाने क्यों अब जाँ मिरी हरदम मचलती रहती है

    बे-हया था बे-वफ़ा अब बे-क'ली का कोई सफ़र
    आदमी की इक़ नि'यत है की बदलती रहती है

    तुम नही जानते मिरी आंखों को क्या खलता है दाग़
    इनमें कोई बर्फ है जो अब पि'घलती रहती है

    आयना-गर फिर तुझे पत्थर की चाहत हो गयी
    ये तिरे सीने में क्या है जो बिगड़'ती रहती है

    दिखते ही मैं चाक दूँगा ये गला फ़ाजिल तिरा
    रे मियाँ कोई ह'वा है जो उछलती रहती है

    दिल-ए-नादाँ इक़ तिरा घर'बार जलने को है फिर
    वो शहर औ' है जहां बारिश बरसती रहती है

    याँ. मु'साइद ढूंढने निकले हो तो घर जा'ओ तुम
    याँ सड़क पर कोई बी'मारी टहलती रहती है

    इक़ जिया तुमसे मिरी बातें नही होती मगर
    इक़ मदीरा चढ़ती रह'ती है उतरती रहती है
    ©parle_g