• parle_g 14w

    रम्ज़- राज , निज़ाम-ए-जऱ - धन विधान ,
    इमाम-ए-सल्तनत - सरकार का शासन
    दर-ए-मिम्बर - भाषण देने का चबूतरा
    शकेबाई - धैर्ये , धीरज
    निहाँ - छुपा हुआ
    रग़बत - आकर्षण
    दीदा-वर - पारखी , जौहरी परख करने वाला

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @anas_saifi ��

    इक़ ग़ज़ल... पेश-ए-ख़िदमत में... बड़े... मामूली से खयालात है...
    तवज्जोह दीजिये ��

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    ग़ज़ल ( कांपता है )

    वज़्न - 2122 2122 1222 2122

    खुलते है कुछ रम्ज तो फिर नि'ज़ाम-ए-जऱ कांपता है
    क्या ब'ला है, की मिरे हा'थ में पत्थर कांपता है

    कुछ हक़ीक़त के दुलारे मुहब्बत से मर गये हैं
    अब मिरे इस शहर का हर कोई दिलबर कांपता है

    याँ इमाम-ए-सल्तनत में हजारों क़ा'तिल हैं वाइज
    कोई कुछ कहता है तो फिर दर-ए-मिम्बर कांपता है

    कबसे हम दिलशाद बैठे है तुमको पाने के ख़ातिर
    अब चले आ'ओ जफ़र, ये दिल-ए-मुज़्तर कांपता है

    रे मियाँ वो सब खदानें श'केबाई की नि'हाँ थी
    इन दुआओं से मियाँ आज-कल बस दर कांपता है

    मौत से रग़बत बुरी भी नही होती दाग़ हज़'रत
    बस जरा सी नींद होती है औ' बिस्तर कांपता है

    मैं रकीबों की नजऱ में धुआँ कब होता हूँ ताबिश
    जाने क्यों अन्दर मिरे, यक मिरा रहबर कांपता है

    कौन है जो इस ग़ज़ल की कहीं कोई चा'हत कहदे
    इन हवा'ओं के घरों में तो दी'दा-वर कांपता है
    ©parle_g