• gannudairy_ 12w

    बैसाखी का त्योहार हो,
    आनंदपुर लगा दरबार हो,
    हो एक शीश की जरुरत आपको,
    मुख शेर जैसी ललकार हो,
    मेरे सतगुरु बाजां वाले,
    मेरा सिर तेरी तलवार हो...!!!

    आप सभी प्रियजनों और उनके प्रियजनों को बैसाखी की लाख लाख बधाईयाँ.. कुछ पाठकों को इस दिन का इतिहास शायद ना पता हो तो मैं आपको कुछ अवगत कराना चाहता हूं इस गीत से.. ये गीत Sukshinder Shinda जी का है जो कि बचपन में मैं बैशाखी पे गाया करता था स्कुल में!!
    1699 जब हिन्दुस्तान की धरती औरंगजेब के जुल्मों और जात पात के ऊँच नीच के भेदभाव से कांप रही थी जब दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने निर्णय लिया कि मैं एक अलग पंथ शुरू करूंगा जिसमें ऊँच नीच का भेद खत्म हो जाएगा और वो पंथ शेरों से भरा होगा जो जुल्मों के खिलाफ लड़ेगा.. तो उस दिन गुरु साहिब के पाँचवे पुत्र खालसा का जन्म हुआ..
    आनंदपुर की धरती पर गुरु साहिब ने बड़ी संख्या में संगत बुलाई और तलवार लेकर कहा मुझे 5 सिर दान में दो.. तो जिनके नाम गीत में हैं उन 5 सूरमाओं ने शीश दान किए और वो 5 प्यारे बने... उनको गुरु साहिब ने अमृत पिलाया और फिर उनसे भी पिया और ऐसा करके ऊँच नीच का भेद खत्म कर दिया.. और सबको एक नाम सिंह और कौर से नवाजा..

    आप सभी को बैसाखी और खालसा सृजना दिवस की बहुत बधाई... ����♥️

    आपको एक और सलाह चाहता हूँ मैं अक्सर कहता हूँ युवा पीढ़ी को इतिहास का नहीं पता कि हम किनके वारिस हैं और हम कहाँ जा रहे हैं तो मैं रोज किसी भी शख्सियत की कहानी पोस्ट करा करूंगा.. आप सभी को ये सुझाव कैसा लगा कमेन्ट करके बताना जरूर.. धन्यवाद!!

    @anusugandh @mamtapoet @_do_lafj_ @alkatripathi79 @jigna_a

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    बैसाखी

    सतगुरु ने संगत बुलाई होया इकट्ठ था बड़ा,
    सन्न 1699 दिन था बैसाखी वाला,
    5 को चुना 80 हजार से,
    खालसा प्रगट किया तलवार की धार से..

    1. "दयाराम" आके कहते मेरे पे दया कर दो,
    सिखी से सिर नहीं महँगा उतार के एक तरफ धर दो,
    दिखती है कोई खेल न्यारी आपकी ललकार से,
    खालसा प्रगट किया तलवार की धार से..
    2. आके फिर "धर्मदास" ने चरणों में शीश नवाया,
    धर्म पे धर्म कमा दो प्यार से अरदास जताया,
    टपक टपक पड़े नम्रता आपके सिख के किरदार से,
    खालसा प्रगट किया तलवार की धार से..
    3. "हिम्मतराय" हिम्मत मारी बड़ा सा करके जिगरा,
    सतगुरु के चरणों में बैठ कहता सिर हाजिर मेरा,
    एक दिन तो जाना होता अखिर संसार से,
    खालसा प्रगट किया तलवार की धार से..
    4. "मोहकम चन्द" तोड़ के आया मोह के सब फंदे,
    मेरे से पहले आ गए उनके भाग्य थे चंगे,
    मुझे भी जीवन बख्श अपनी तलवार से,
    खालसा प्रगट किया तलवार की धार से..
    5. "साहिबचन्द" साहिब के आगे बैठ गया पकड़ के पल्ला,
    थोड़ा सा देर हो गया उतार दो सिर मार के हल्ला,
    मिलते हैं ऊंचे रुतबे आपके दरबार से,
    खालसा प्रगट किया तलवार की धार से..

    पांचो से अमृत लिया पांचो को आप पिलाया,
    कहे आनंदपुर की धरती अलग इतिहास रचाया,
    गीदड़ों को शेर बनाया,
    सबको एक सिंह नाम के धागे में लगाया अलग अलग नाम से,
    खालसा प्रगट किया तलवार की धार से..!!!

    ©gannudairy_