• parle_g 6w

    ना-ग़वार - जो हमें पसन्द नही
    सहरा - रेगिस्तान, उजाड़
    गर्द-ओ-गुबार - रेत का तूफ़ान
    सिफ़ाल - मिट्टी का प्याला
    मजार - कब्र
    अक़ीदा - विश्वास
    जार-जार - टुकडो में

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @anas_saifi ��

    इक़ ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत में.... आप सभी की निगहबानी चाहती है ��
    तवज्जोह दीजियेगा.... हर शेर पर धड़कने लगी है ��

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    ग़ज़ल ( आ रहा है )

    वज़्न - 2122 2122 2121 2122

    क्या है कुछ कुछ इश्क में जो ना-गवार आ रहा है
    रे मियाँ मुझ'को ये कैसा अब बुखार आ रहा है

    मैं तिरी आंखों में भटका हूँ मिरी ये प्यास लेकर
    अब तिरे सहरा में यक गर्द-ओ-गुबार आ रहा है

    अपने अपने अक्स की कुछ सूरतें सिफाल रखलो
    आ'ज कोई आयना जब्त-ए-दरार आ रहा है

    काट मैं भी सक'ता था गर्दन किसी दिलाशें में फिर
    अब किसी दुश्मन पे मुझ-को, एतिबार आ रहा है

    दाग़ में उन कश्तियों में खू'न भर रहा हूँ अपना
    दाग़ देखो, आज सा'हिल में भी ज्वार आ रहा है

    तुम कहो यक दिल ले लूँ खा'तिर तिरे, तू खेल ले'ना
    कुछ क़दम चलकर दुकाँ कोई बजार आ रहा है

    मौत अपने जिस्म को मह'रू'मियत बनाती है राग
    हर कोई हज़रत मुहब्बत में म'जार आ रहा है

    ये अक़ीदा भी ज़िया अब कोई हादसा है हर दिन
    कुछ तो है जो आज़कल फिर जार-जार आ रहा है
    ©parle_g