• yusuf_meester 20w

    इब्तिदा-ए-इश्क़ की मदहोशियाँ क्या कहें
    दिल में होती है , किलकारियाँ क्या कहें

    नजरों में जबसे छू लिया है सुरत तेरी
    दिन रात करती है गुस्ताख़ियाँ क्या कहें

    मैं नहीं साथ किसी आवारा शाम के, पर
    ख़्वाब करने लगा , बदमाशियाँ क्या कहें

    सितारों ने तो पर्दे यूँ ही डाल रक्खे हैं
    हमने तो चाँद पे डाली डोरियाँ क्या कहें

    कोई ख़ता तो नहीं खुशबू-ए-गुल बनना
    गुलशन ने कर दी नादानियाँ क्या कहें

    वो अब भी नहीं क़ैद ज़ंजीर-ए-वफ़ा में
    करने लेने दो उन्हें मनमानियाँ क्या कहें

    "यूसुफ़" कुछ तो कमी रह गई मुहब्बत में
    हो गई होगी , गलतफ़हमियाँ क्या कहें

    ©यूसुफ़ मिस्टर