• rajput_pankaj 17w

    भिखारी

    मैं भिखारी हूं जात का
    खाता हूं मैं मांग कर
    रग रग मेरी शर्म बसी
    बिगाड़ोगे क्या लाठी भांज कर
    हूं इतना ढिट मैं
    हर रोज तमाशा नया कर बैठूं
    घर बना रहा हूं रिस्वत से
    दुश्मन से ले ले कर ईंट मैं
    कभी किसानों के नाम के हला
    कभी आरक्षण की नौटंकी करता हूं
    मुझे मतलब नहीं
    देश में होने वाले कोहराम से
    बस मैं घर अपना अपना भरता हूं
    है अनपढ़ मुर्ख लोग यहां
    जो मेरी बातों में आ जाते हैं
    अपनों के ही बन बैठे है दुश्मन सब
    अपनों के ही घर जलाते हैं
    अब बैठा हूं सड़कों पर
    नाम किसानों का ले रखा है
    पर सच्च तो ये ही है सारा
    के मैंने जमीर गिरवी दे रखा है
    मुझे फर्क नहीं किसी के मरने से
    मतलब है बस खुद की जेबें भरने से
    कभी भूख हड़ताल पर बैठूं
    कभी देश बंद का आह्वान देता हूं
    मगर मुफ्त में कहा कुछ करता हूं
    मैं देश बेचने का पैसा दुश्मनों से लेता हूं
    अपमान सहा तिरंगे ने
    वो सब मेरी ही रचि कहानी है
    तोड़ रहे थे नियम जो सारे
    वही तो भटकी हुई जवानी है
    सब चोर हुऐ है इकट्ठे एक जगह
    वास्तव में यही एक सच्चे राजा की निशानी है
    समय बदला युग बदले बदल गया माहौल भी
    दिन दूर नही रहा अब वो भी
    ज़ब खुल जाएगी चोरों की पोल भी
    ©rajput_pankaj