• hindikavita 52w

    बिखरी है राख राहों पर सुबह सुबह
    मानो कोई ख्वाब जला हो अभी अभी
    हिलती है साख पेड़ों पर सुबह सुबह
    मानो कोई दूर उड़ा हो अभी अभी
    कुछ पत्ते गीले दीखते हैं
    मानो अश्क समेटें खुद में हों
    मद्धम मद्धम सी हवा भी है
    बेताब हुई कुछ कहने को
    क्या लौट के फिर वो आएंगे
    इक रात सिरहाने पर मेरे
    या फिर से गुल हो जाएंगे
    जब नींद खुलेगी सुबह सुबह

    क्या कल वो फिर से चहकेंग्गे
    जिसने रात बिताए क्रंदन मे
    बेचारे वो सारे पंछी
    जो लौट ना पाए उपवन में
    क्या कल वो फिर से टर्राकर
    ईश्वर से गुहार लगाएंगे
    आश लगा के बैठे थे जो
    भूतल के वो सारे मेंढक
    क्या ओस की बूंदे कर पाएंगी
    शीतल उनके बीते कल को
    या सूरज की किरणे लायेंगी
    उजियारे में उनके मन को
    कैसे उनको आश मिलेगी
    फिर से मेहनत करने की
    टूटा मन क्या जुड़ पाएगा
    जब नींद खुलेगी सुबह सुबह
    ©hindikavita