• raakhaa_ 8w

    #faaltu_baatein
    �� गोविंद��

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    उसके होने का एहसास अलग है! बहुत अलग...

    उसकी बांसुरी में जितना वो है, उतना ही उसके मोर पखा में। जितना वो अपने माखन मिश्री के भोग में दिखता है, उतना ही अपने कानों के कुंडल में चमकता है। जितना अपने चन्दन टीके में निखरता है, उतना ही अपने चरणों मे समर्पित तुलसी में महकता है! जितना वो अपने विग्रह में समाया है, उतना ही अपने भजनों में सुनाई देता है।

    अपने कमरे से दूसरे कमरे तक के सफर में उसकी झांकी पड़ती है। मैं हर बार ठिठक कर , उसे दो पल निहार कर ही गुज़रती हूँ। सुबह उसका श्रृंगार मैंने ही तो किया था! मैंने ही उसे पीताम्बर में सजाकर, तिलक किया था। उसके कंठ में एक माला, हाथों में चूड़ा, बाहों में बंसी, चरनों में तुलसी और सिर पर मोर मुकुट .... मैंने ही तो रखा था। पर उसे जितनी बार निहारती हूँ, मानो ऐसा लगता है, जैसा श्रृंगार किया था उससे सौ गुना ज्यादा निखरा हुआ रूप है।

    मैं नही समझ पाती ये क्या लीला है! ये प्रेम है, अपार प्रेम...ये भरोसा है, धैर्य है, मैत्री है, समरपण है....या इन सबका समावेश...पता नहीं।

    मैं बस इतना जानती हूँ, वो गोविंद है, और मैं .... और मैं? मैं...पता नहीं!!
    ©raakhaa_