• rangkarmi_anuj 12w

    आभास

    सुनो,
    हम दूर अवश्य हैं
    परन्तु हम कहीं न कहीं हैं,
    जैसे भोर में तुम
    पत्तियों की ओस में हो,
    मैं तुम्हारे आँगन की
    तुलसी का फूल,
    तुम दिवस की सूरजमुखी
    मैं रात्रि का जुगनू।

    हम कहीं न कहीं
    प्रकृति में मिलेंगे
    शीत पवन तुम्हें स्पर्श करे
    तो समझना कि मैं हूँ,
    और पेड़ की छाया के नीचे
    मैं विश्राम करूँ अर्थात वो छाया तुम हो,
    पूजा घर के दीये की रोशनी तुम
    और उसका औरा मैं।

    हम हैं आस पास
    भले ही आमने सामने नहीं,
    लेकिन आभास और पूर्वाभास
    में सदैव रहती हो,
    रात्रि के जागरण का
    कारण तुम हो क्योंकि
    मैं रात्रि में ही तुम्हारे लिए
    एक नई रचना लिखता हूँ,

    और तुम उसे एकांत में
    प्रकृति की सहेलियों के
    पास बैठकर मुस्कुरा कर
    हृदय से लगाकर पढ़ती हो।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj