• radhika_1234569 13w

    फूलों से इत्र ,
    आंसुओ से स्याही बनते है !
    कागज़ो पर उकेर,
    हर दर्द की ज़ुबानी कहते है !
    रिसते थे मोम सा,
    जो कतरा-कतरा होकर कभी !
    क्यों पत्थर सा लिए,
    अक्सर वो दिल ही मरते है !

    समझ की आग में ,
    क्यों हर ख्वाब स्वाहा होते है !
    न आस न कोई पास है,
    क्यों खुद को सताया करते है !
    दो चार दिन की ज़िंदगी में
    क्यों अहंकार जगाया करते है !
    तुम वही हम भी वही,
    क्यों वहम को अहम बनाया करते है!