• hindikavita 63w

    कर्मों में कुशलता है
    पर लगती हाथ विफलता है
    चाहे जितने भी यत्न करूं
    परिणाम वहीं निकलता है
    मन में उठती हैं दुविधाएं
    पर कुछ ना मैं कर पाता हूं
    मैं बस चुप सा रह जाता हूं
    मैं बस चुप सा रह जाता हूं

    हूं कोसता नियति को अक्सर
    हांथों में लकीरें खोजता हूं
    मैं वर्तमान में बैठ के भी
    भूतकाल की सोचता हूं
    अवरुद्ध कंठ की पीड़ा से
    मैं फिर कुछ ना कह पाता हूं
    मैं बस चुप सा रह जाता हूं

    हृदय में हैं उन्माद बहौत
    मस्तिष्क कोप में जलता है
    हैं हस्त बंधे परिणामों से
    और पांव तनिक ना चलता है
    तिरस्कार के दागों से मैं
    फिर ना खुदको धो पाता हूं
    मैं बस चुप सा रह जाता हूं
    मैं बस चुप सा रह जाता हूं

    संघर्षों के मेले में
    राहों में अकेले में
    अथक मैं चलता जाता हूं
    मैं अपनी बात बताता हूं
    मैं बस चुप सा रह जाता हूं
    मैं बस चुप सा रह जाता हूं।

    @mirakee @hindiwriters @mirakeehindiwriters @writersnetwork

    Read More

    ©hindikavita