• shristi_dubey 23w

    मसान

    मसान की हवा में कुछ अलग ही नूर है
    अपनी मरघटे जलाना सबको नामंज़ूर है।

    किसीका लाखो में एक, लाखो के जैसा बन जाता है,
    तो किसी के माथे का सिन्दूर कही दूर उड़ जाता है।

    यह कैसा दस्तूर है, पुरा मानव जाती मजबूर है।

    मरघट में जलकर माटी में समाना मंज़ूर नहीं, यह तो कोई दस्तूर नहीं।
    शव सा जलकर कोई कुछ नहीं कर पाया
    जीवन में सूरज सा जलकर
    महान व्यक्ति अमर हो पाया।
    ©shristi_dubey