• nishadevis 32w

    " ईश्वर को भी दुःख होता होगा "


    मानव की सुंदर रचना को रचकर।
    अब ईश्वर को भी दु:ख होता होगा।।

    अरे ! अपने ही रचनाकार को मानव,
    धर्म, मजहब में बाँट रहा,
    अलग-अलग धर्मों में बाँटा,
    अलग-अलग धर्मग्रंथों में,
    अलग-अलग धामों में बाँटा, 
    अलग-अलग नाम, पहचान में,

    मानव की सुंदर रचना को रचकर।
    अब ईश्वर को भी दु:ख होता होगा।।

    प्रेमरंग से रंगा तनमन को, 
    प्रेमधर्म से रचा तनमन को,
    प्रेमभाव से भरा तनमन को,  
    तब मानव की सुंदर रचना की, 
    पर मद में सबकुछ भूला मानव
    भेदभाव की सरहदें बाँट रहा,
    खून का रंग भी न देख रहा, 
    और धर्म, मजहब में बाँट रहा,

    मानव की सुंदर रचना को रचकर।
    अब ईश्वर को भी दु:ख होता होगा।।

    अरे! बहते झरने, बहती नदियाँ, 
    क्या किसी धर्म, मजहब की प्यास बुझाती हैं। 
    खेत - खलिहान, बाग - बगीचे, 
    क्या किसी धर्म, मजहब की भूख मिटाते हैं। 
    हरेभरे लहलहाते ये वृक्ष, 
    क्या किसी धर्म, मजहब को छाया देते हैं। 
    पवन के झोंके, वर्षा की रिमझिम फुहारें,
    क्या किसी धर्म, मजहब का मन लुभाते हैं। 
    सूरज, चाँद, चमकते तारे, 
    क्या किसी धर्म, मजहब को रोशन करते हैं।

    मानव की सुंदर रचना को रचकर। 
    अब ईश्वर को भी दु:ख होता होगा।।
    ©nishadevis