• parle_g 14w

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @anas_saifi @prashant_gazal @iamfirebird ��

    इक़ ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत में...
    बड़े...फ़ालतू से...खयाल है..... मगर कुछ तवज्जोह चाहते है
    ��.....

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    ग़ज़ल ( रोये )

    वज़्न - 2122 2221 2221 2122

    रात गहरी थी कल बुलबुल-ए-नाशाद करके रोये
    जाने कितने गम ता'बिश तिरे ईजाद करके रोये

    ये निशानी जाने किस'की है हामिल बताओ हमको
    कौन है वो आदम जिसको याँ हम याद करके रोये

    महफिलों से दिल उक्ता रहा था दाग़ सहते कब तक
    कल किसी शायर के शेर पर इर'शाद करके रोये

    बुत-शि'कन ही अब वा'इज कहो हमको जमाने मे याँ
    वो हमी है जाहिल, जो कहीं फरियाद करके रोये

    सुनो मर जा'ना भी इत'ना आसानी भरा नही है
    हम'ने देखा था तुम भी सदा-जल्लाद करके रोये

    कुछ पलों में ही मारा गया हर इक परिंदा लानत
    हम परिंदे भी हर दिन मियाँ,आजाद करके रोये

    गर्द उड़ने वाली है हथेली से बचा लो सबको
    हम तो पत्थर के थे पर , हमीं फरहाद करके रोये

    इक़ सजा से कोई फायदा हम'को नही जिया अब
    अपने क़ातिल का हर फ़ैसला हम दाद करके रोये
    ©parle_g