• deepajoshidhawan 97w

    यादें

    जुड़ी थी तुझसे जो वो हर याद बिसारी है
    हमने ज़िन्दगी बड़ी मुश्किल में गुज़ारी है

    दिल के पिंजरे में यादों को हलाल करता है
    वक़्त भी देखो बड़ा ज़ालिम सा शिकारी है

    देखा किये थे साथ कभी चाँद तारे बैठकर
    बेगैरत छत ने माँग ली वो अपनी उधारी है

    हकीकत से क्यों अनजान बना फिरता है
    दिल को चढ़ी न जाने कौन सी खुमारी है

    आगे बढ़ें या लौटें दोनों सूरतों में चैन कहाँ
    चल रहे हैं जिस पर हम तलवार दुधारी है

    जान देने का वादा किया था जिसने कभी
    उस शख़्स ने ही अब दिल से बात उतारी है

    दोगलेपन की सी महक आती है ज़माने से
    यकीन है हमको इसमें सभी की शुमारी है
    ©deepajoshidhawan