• ayushsinghania 15w

    मेरे मन का उलझा गीठठा,
    रोज़ उलझता , रोज़ सुलझता;
    सोचो कितना ज़ोर का बांधा,
    तेज उलझता , धीमे खुलता;
    जैसे,
    खुला संमदर और अपनी कश्ती,
    दूर क्षितिज तलक सिर्फ़ अपनी बस्ती;
    थोड़ा थोड़ा रोज़ उलझते,
    थोड़ा थोड़ा रोज़ सुलझते....!
    ©ayushsinghania