• _relatable_asa_ 71w

    देख रहा हूँ मै आजकल,
    बारीश की बुँदे थोडीं घबरा गईं हैं,
    थोडी गिर रहीं, थोडीं हवा में हीं पिगल रहीं हैं।

    चीख रहे हैं पेड पौधे,
    जानवर और पक्षि भी,
    कहते, "घर, वाले नहीं देते, चुल्लू भर पानी और बचा हुआ खाना भी।"

    "क्या करूँ कैसे बरसूँ?
    बच्चे मेरे भूके भी।"

    "बरस ना माँ, थोडा तरस ना माँ,
    भूके हैं, और प्यासे भी,
    हमारा छोडो,
    थोडे कल ही जन्मे हैं, नहीं देखी उन्होंने दुनिया भी।"

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