• deepajoshidhawan 21w

    चाय

    चाय जब तक तुम हम पे यूँ मेहरबान हो
    किसी बात से भला हम क्यों परेशान हो

    संग तलब के तुम्हारी नींद अब है खुलती
    बेताब हम जिसके लिए वही अरमान हो

    बिस्कुट संग चुस्कियां दो चार लगाते ही
    मिट जाती है चाहे कितनी भी थकान हो

    हाथ से पकड़ते ही तुम्हारी ये गर्म प्याली
    देखते ही खुश हो जाता कोई मेहमान हो

    सपनों से निकाल कर , नज़रों के सामने
    ला देती वो कॉलेज कैंटीन की दुकान हो

    अपनी रईसी पर इतराती रहे भले कॉफी
    तुम आम जनता के दिलों का आराम हो

    हर दिल अज़ीज़ हो, फिर भी न इतराती
    ज़मीन से जुड़ी रहकर बड़ी ही महान हो

    हमारी राय जो कोई कभी कहीं भी मांगे
    यही दोहराएंगे, चाय तुम हमारी जान हो
    ©deepajoshidhawan