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    यादें अगर बोल पाती,
    तोह कहती,
    हमें तो जब चाहें, जहा चाहें,
    बुला लिया करते हो।
    मगर, उसका क्या?
    जिसके साथ मिलकर तुमने हमें बनाया था,
    उसका क्या?
    जिसके लिए, तुमने हमें बनाया था,
    उसका क्या?
    जिसके जाने के अफ़सोस में,
    तुमने हमें आज याद किया है।
    क्या हुआ उसका?

    यादें अगर बोल पाती,
    तोह कहती,
    उसके आने का तो पता नहीं तुमें!
    मगर, हमें बुला लेते हो,
    एक जाम हर शाम?
    इतनी सस्ती,
    तो नहीं थी उसकी यादें!
    इतनी कड़वी,
    तो नहीं थी उसकी यादें।!
    मगर यह यादें भी तो,
    उसकी अकेले की नहीं थी।
    थी क्या?

    यादें अगर बोल पाती
    तोह कहती,
    कब तक?
    आखिर कब तक, हमें यू याद करोगे?
    बिन बुलाए हर रात,
    हमारे दरवाजों पर दस्तक दिया करोगे?
    कब तक?
    आखिर कब तक, हमें यू बदनाम करोगे?
    हर शाम शराब के साथ,
    हमें बाजारों में शर्मसार(/नीलम) करोगे?
    आखिर कब तक?

    यादें अगर बोल पाती
    तो कहती,
    हम तो महज़ यादें है,
    कुछ पल जो तुमने,
    आज नहीं तो कल बिताने है।
    हमें मेहेज़ यादें ही रहने दो,
    वक़्त की कुछ बातें बाद के लिए रहने दो।

    हम तो मेहेज यादें है।

    ~ देवेश जोशी
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