• succhiii 42w

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    मरासिम -रिश्ता
    मह -चाँद
    मुसलसल -लगातार
    मीटर - 1222 1222 1222

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    ग़ज़ल -अक्स

    कोई तस्वीर हर्फ़ों में उभरती है ।
    महक यादों की पन्नो में उतरती है ।

    चमकते हैं कई जुगनू इन आँखो में..
    शबे-ग़म यूँ ही अश्क़ो से सँवरती है |

    उतरता है ज़मीं पर अक्स जब मह का ..
    नमी पलकों की कोई ख़्वाब बुनती है |

    मुसलसल रूठ जाना हो शग़ल जिनका ..
    वो क्या जाने दिलों पे क्या गुजरती है |

    कोई ख़ामोश है कुछ इस तरह लोगो ..
    पहेली और भी दिल की उलझती है |

    तुझी को ढूँढते हैं तुझ में गुम होकर ..
    शमा हर पल यूँ सुब्हो -शाम जलती है |

    कोई सदियों का बाबस्ता था तुझसे..जो..
    मेरी राहें तेरे दर से गुजरती है ।

    ©succhiii