• dr_seema 70w

    वो बात बात बार रूठता रहा मैं उसको मानती रही
    कुछ इस तरह मैं ख़ुद से ख़ुद की खुशियाँ उजड़ती रही,

    वो चीखता था मुझपर और मैं प्यार उसे समझती रही,
    कुछ इस कदर मैं अपनी ज़िन्दगी ज़हन्नुम बनती रही,

    वो रोकता रहा यहाँ वहाँ जानें से मुझे,
    मैं बस हां में ही सर हिलाती रही,

    वो नापता गया लम्बाई मेरे कपड़ो की,
    मैन उसकी हर बात सर-आँखों पर उठती रही,

    वो कह देता शायद पहले ही के प्यार नहीं है मुझसे,
    वो तो मैं ही बेबकुफ़ थी जो उसके आगे गिड़गिड़ाती रही,

    वो बात बात पर रूठता रहा मैं उसको मानाती रही,
    कुछ इस तरह मैं खुद से खुद की खुशियाँ उजाड़ती रही,

    म़र्जी से अपने वो मुझे फ़ोन करता,
    म़र्जी न हुई तो १०० कॉल भी मेरे वो इग्नोर करता,
    मै फिर भी उसकी दीवानी बनती रही,
    अपनी ज़िन्दगी अपने ही हाथों से तबाह करती रही,

    बत्सालुखियाँ उसकी फिर सब को नज़र आने लगी,
    ताने सुन सुन कर मेरी शामें गुजरती रही,

    इतने में भी वो मेरा नहीं किसी और का होता रहा,
    मैं उसकी और सिर्फ उसकी बनती रही ,

    कुछ इस तरह मैं उसको अपनी दुनिया बनाती रही,
    मै खोती रही खुद को खुद मे और उसको समाती रही,
    कुछ इस तरह बेहिसाब पाक मोहब्बत मैं उसको जताती रही।
    ©dr_seema