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    ताग - धागा
    सर्दखाना - मुर्दाघर

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    तीसरा और आखिरी शेर बदौलत है जिया खान के������

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    ग़ज़ल

    लेकर के दिल में कोई एक आग बैठ गया,
    फूल सारे मुरझाने लगे और बाग बैठ गया!

    कैसे बताते उन्हें के ये इश्क़ मेरा सच्चा है,
    मज़हब का नाम लिया और दाग बैठ गया!

    कोई चुनर तेरे ना'म की थी सर्द-खाने में,
    और फ़िर उसी मलमल का ताग बैठ गया!

    स्याह जिंदगी का मैं करता तो क्या करता,
    उम्मीद का सूरज दिखा तो चराग बैठ गया!

    तुम चले आओ तो रंग गालों पर लगाये,
    कहीं ऐसा न हो के बेरंग ये फाग बैठ गया!
    ©dipps_