• sh_gopal 36w

    जाना हमें था धरती से दूर ,
    जहाँ नहीँ है किसी का अस्तित्व
    सफ़र था हमारा चन्द्रयान से
    तुम विक्रम सी मैं प्रज्ञान तुझमे ही था
    इस धरती से चल दिए हम
    उस चाँद को गले लगा लिए
    कुछ मस्ती हमने की वहाँ
    मतलबी दुनिया से तोडा सम्पर्क हमने
    अब हम दोनों ही हैं इस चाँद के हकदार
    जीवन मेरा तुम हो मृत्यु भी तुम में ही हो
    दो दिल थे अधूरे जो हिस्सा थे एक दूसरे के
    पूरे चाँद पर एक चेतना तुम ही हों
    दूसरा वो सूरज जो गर्मी जगाता हममें
    एक तीसरा था ऑर्बिटर जो सम्पर्क कर रहा हमसे
    हम भी कितने मस्त और व्यस्त कि
    हमारी जिंदगी पूरी होने आई
    हम एक दूजे में ही रह गए
    अनन्त चेतना में सो गए
    नही हुआ सम्पर्क मतलबी दुनिया से
    तुम विक्रम सी मैं प्रज्ञान सा
    हजारों सालो बाद जब कोई आएगा
    तब भी मुझे ,तुझमें ही पायेगा
    ©sh_gopal