• malay_28 111w

    वक़्त तो वक़्त है अच्छा क्या ख़राब क्या
    इत्र छिड़क देने से क़ाग़ज़ का ग़ुलाब क्या !

    जो महक ना सके किसी की यादों में तन्हा
    उठती गिरती उन साँसों का हिसाब क्या !

    कुछ पल ही सही ग़मों को भुला ना सके
    पैमानों में लरज़ती छलकती शराब क्या !

    नज़रों से उतर कर किसी के कहाँ जाएँ
    बेआबरू हो कर पहने फिर हिज़ाब क्या !

    रिश्तों को तौलो नहीं शब्दों की कमान पर
    भावनाओं को समझे ना, वो मिजाज़ क्या !

    दिल के कमरे में एक चिराग़ तो जलाओ
    मन का तिमिर मिटा ना सके वो चराग़ क्या !

    ©malay_28