• isolated_atom 24w

    बस यूँ ही!

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    वियोगी निशा की भी होती है दुपहरिया,
    जहां खिलखिलाते हैं शोक,और विषाद
    लेती है अंगड़ाई।
    झपकी लेती है,आषाढ़ माष के भास्कर की अनंत किरणें।
    जहां लेखक की कलम मरूस्थल में लिपटकर
    जन्म देती है एक पंकज को और प्रतिद्वंदी हो जाता है,
    निशा की शीतलता का।

    वहीं पन्ने समेटते हैं,
    संपूर्ण ब्रह्मांड के लेखकों द्वारा रचित शब्दों को,
    और उन्हें अपनाकर,
    उनके भावों को वियोग से
    संयोग में परिवर्तित करते हैं।

    ~सोनल