• dedestined 13w

    ट्यूनिंग

    क्यों नहीं बनती है,
    माँ से, बाप से, माँ-बाप से?

    माँ-बाप को लूटने, धोखा देने, या बेदख़ल कर देनेवाले औलाद की बात नहीं हो रही,
    बेटियों को गर्भ में मार देनेवाले माँ-बाप की बात नहीं हो रही

    सरल, शरीफ़, भले खानदान में...

    क्यों नहीं समझते पिता,कि फैशन डिज़ाइनर भी करियर होता है,
    और ये कि दर्ज़ी भी इंसान होता है? दर्ज़ी चोर तो नहीं होता? क्या शर्मिंदगी है दर्ज़ी बनने में?

    अपने से बड़ी औरत से प्रेम हो जाना गुनाह है? आदमी के लिए? क्यों माँ को कहने में नहीं अटकता, 'मेरा मरा मुंह देखेगा', क्यों चुनना होगा आदमी को माँ और प्रेमिका के बीच एक को?

    बुढ़ापे में माँ-बाप का ध्यान रखना बेटे का (और बेटी का भी) फ़र्ज़ है,
    "पोते-पोती देना" किसी का फ़र्ज़ नहीं है...
    नहीं हो सकता, होना बहुत पीड़ादायक/खतरनाक है, अपाहिज बच्चा पैदा होने का खतरा है,
    अरे! हमारी ज़िंदगी के तऱीके, उम्मीदें कुछ और हैं! हमें सपना ही नहीं है बच्चों का, बच्चे बड़े करने का...
    ये कैसा फ़र्ज़ है, पीढ़ियाँ बढ़ाने का?

    माना कि बड़ी ग़रीबी में बड़े हुए पिता, पाई-पाई जोड़कर बंगला बनाया
    बरामदे की फ़र्श पर "पत्तियाँ गिरती हैं", सो पेड़ कटवा देंगे?
    बया को
    और चमगादड़ों को
    बेघर कर देंगे
    पाई-पाई जोड़कर घर बनानेवाले पिता?

    जिन्हें देख-समझ,
    जिन्हें सुन-सीख-विचार
    बड़े हुए, इंसान हुए...
    जिन्हें - धार्मिक "बाबा" कहते हैं - "भगवान" समझना चाहिये
    उन्हें
    ना-इंसान जान
    कितनी कड़वाहट और हताशा होती है

    ©dedestined