• kashtandon 15w

    Bachpan or waqt

    बचपन में माँ वक़्त से घर आने को बोलती थी।
    और नादान बचपन खेलने को दौड़ ता था।

    नाजाने क्यों सूरज उस माटी के मैदान से जल्दी चला जाता था
    और वही चंदा मामा पूरी रात चिढ़ाता मुसकुराता था।

    एक ज़िद है वक़्त को पकड़ के थाम लेने की
    और समय को आगे न बढ़ने देने की।

    पर वक़्त और समय की गहरी दोस्ती है
    वो हर लम्हा अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे है।

    नादानी था बचपन का ,गोल घुमते वक़्त को पकड़ के थाम लूंगा।
    और चिढ़ाते मुस्कुराते चंदा मामा को आज न आने दूंगा।

    लम्हा यादों में थमगाया और वक़्त पहिया पकड़े आगे बढ़ गया।
    आज समझ है वक़्त से घर आने की
    और अब तो उम्र है दोस्ती चांद से निभाने की।

    दिल में छुपा एक सवाल हर रोज़ जवाब टटोलता है
    क्या आज भी वो सूरज उस माटी के मैदान से जल्दी अपने घर को लौटता है।

    ©kashtandon