• a_poet_in_the_north 72w

    ये ज़िन्दगी ।

    थोड़ी तनहा थोड़ी बेकार
    सी है शामें सभी ,
    जो कभी रंगीन और खुशनुमा
    हुआ करती थी ।
    कहाँ गयी वो हसीन किलकारियां ,
    जो मन के आँगन को
    चहका दिया करती थी ।
    क्युँ मायूसी के बादल ज़ोरो से
    गरज रहें हैं आज ,
    जबकि खुशहाली मेरे दामन से
    हर वक्त लिपटी रहा करती थी ।
    क्या ये जिवन का कोई
    कड़ा मोड है ,
    या इन ढलती किरनों से आगाज़
    कर रहीं है एक नयी और बैहतर सुबह कि ये ज़िन्दगी ।
    ©a_poet_in_the_north