• kpardeep 55w

    मज़दूर

    चाहे गर्मी हो या सर्दी, चाहे बारिश हो या आंधी,
    हर मौसम से मैं दूर हूं, मुझे गर्व है अपने आप पे,
    हां मैं मज़दूर हूं।

    अपना शरीर तोड़ के मिट्टी में मिल जाता हूं
    दिन रात मेहनत करके हक की रोटी खाता हूं,
    रहता हूं बेशक टूटी सी झोंपड़ी मैं,
    पर दूसरों के लिए महल बनाता हूं,। मुझे गर्व है अपने आप पे, हां मैं मज़दूर हूं।

    अपने खून पसीने से सींच कर
    इस धरती की प्यास बुझाता हूं,
    अपनी मेहनत के दम पे इस पर अन्न उगता हूं,
    खुद भूखा रह के,दूसरों की भूख मिटाता हूं,
    मुझे गर्व है अपने आप पे, हां मैं मज़दूर हूं।







    ©kpardeep