• mamtapoet 6w

    मां को छांव चाहिए थी,
    मां ने रोपा एक बरगद।

    पिता जी को छत चाहिए थी
    उन्होंने बनाया घर।

    मां दिनभर तपती रहती हैं रसोई में,
    कितना भी करलू मैं बरगद की छाया वहां तक जाती नहीं।

    घर में भी पिता जी महीने में एक आध दिन ही रह पाते हैं।

    छोटा हूं न, समझ नहीं हैं,
    मैंने उगाया गुलाब,
    मां जिसे भगवान को चढ़ाती है।

    और पिताजी भी कभी कभी गुलाब तोड़कर
    मां के बालों में लगाते हैं।

    मिल जाती हैं फ़िर मां को और
    पिताजी को एकसाथ एक छत ,
    छाया भरी।।
    ©mamtapoet