• vipin_bahar 112w

    बाज़ार पड़ा हैं मन्द प्रिये,
    ऐसे न करो अब द्वन्द प्रिये,
    मिलने की इतनी ज़िद्द कैसी..
    तुम्हें पता हैं भारत बंद प्रिये..
    मन बहुत ज्यादा विचलित हैं
    देश कोरोना से संक्रमित हैं,
    तुम तो पढ़ी-लिखी हो..
    क्या बताऊँ इश्क़ की गणित हैं,
    ऐसे भी क्या मिलना..जब मिलन में उलझन हों,
    नजरों में क्या रखा हैं..जब तक न आलिंगन हों,
    बाहर जारी हैं अब जंग प्रिये,
    घर में ही लेते है आनन्द प्रिये,
    मिलने की इतनी जिद्द कैसी..
    तुम्हें पता है भारत बंद प्रिये,
    जीवन जीता हूँ अब नाप-तोल हैं,
    कही हो न जाऊं सृष्टि से गोल हैं,
    कही नही आता-जाता हूँ..
    दृश्य देख लेता हूँ खिड़की खोल हैं,
    तुम्हें क्या बताऊँ मैं..इस चोटिल मन का भेद हैं,
    छत पे भी न जाता हूँ..घर में रहता हूँ बस कैद हैं,
    तड़प रहा हैं ये अंग-अंग प्रिये,
    बदलना हैं जीने का ढंग प्रिये,
    मिलने की इतनी जिद्द कैसी..
    तुम्हें पता हैं भारत बंद प्रिये,
    तुम फोन पे ही अब लड़ लो,
    हृदय में मेरे स्वप्न को गढ़ लो,
    और फिर भी मन न लगे..
    तो मेरी शायरी को जान पढ़ लो,
    तुम एकांत और शांत रहकर..इस इश्क़ को लय दो,
    इस महामारी के माहौल में..तुम धैर्य का परिचय दो,
    हम लिख रहे दोहा-छंद प्रिये,
    तुम बने रहो घर मे मकरंद प्रिये,
    मिलने की इतनी जिद्द कैसी..
    तुम्हे पता है भारत बंद प्रिये...
    विपिन"बहार"
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    Vipin_bahar
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