• parle_g 14w

    ला-जमीरी - कुछ छुपाए रखना
    लहजा-ए-गुफ़्तार - बात चीत करने का ढंग
    मरघट - श्मशान घाट
    अजकार - दुआएँ
    पिंदार - घमण्ड , अभिमान
    सफ़ीना - नाव
    कलमा-ओ-फ़नकार - कलम औऱ आर्टिस्ट

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @anas_saifi ����

    ख़्वातीन-ओ-हज़रात इक़ ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत में....
    तवज्जोह दीजियेगा��....

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    ग़ज़ल ( उठ गये )

    वज़्न - 2122 2122 2122 1221 2

    ला-जमीरी में थे फिर लहजा-ए-गुफ़्तार से उठ गये
    हम किसी मरघट के पत्थर थे जो दीवार से उठ गये

    उन निगाहों की कहा'नी हर कोई कहता है याँ जफ़र
    जिन निगाहों के अ'सीरी दाग़ घर'बार से उठ गये

    लाओ अपने हाथ कटवा लो मिरे पहलू में आके तुम
    ये गुमाँ अच्छा नही गर तुम भी तल'वार से उठ गये

    जाने कबसे लोग सिर'हाने बैठे है मिरी जात के
    कम्बख्त ऐसा नही की यक दो बी'मार से उठ गये

    इक़ हक़ीक़त है की मरने वाले है सब किसी गश्त में
    देखो ना बाहर वो फ़ाजिल भी जो अजकार से उठ गये

    सोचते थे इस मुहब्बत को ठिकाने लगा देंगे हम
    कुछ दिनों की मोह'लत थी, हम ही पिंदार से उठ गये

    हर सफ़ीना ख़ून के सा'हिल में तैरा नही करती पर
    हम नसीहत में नही आये, औ' मझदार से उठ गये

    जो मिरी साँसों का मंदिर था ग़ज़ल ही थी कोई जिया
    दाग़ अब वो हाथ भी कल'मा-ओ-फ़न'कार से उठ गये
    ©parle_g