• anandbarun 17w

    प्रयास

    खड़े रहो ना भींचे हाथ
    कदम ढूंढ़ता तेरा साथ,
    जो इनमेंं रम जाए ताल
    खुलते जाऐं राह हज़ार।
    घिर जंजालों के अंबार
    सूझे ना कित उतरें पार,
    रुके रहो ना यूँ मझधार
    गति में मर्म अरु है सार।
    घनीभूत चिन्ता भरमार
    सुरसा लेती रहे आकार,
    तोड़ो भ्रम की ये दीवार
    पग है नैया कर पतवार।
    आस जगे जब बेशुमार
    राह नवेली खुले अपार,
    उठे कदम जब हर बार
    दिखते जाते आगे द्वार।
    ©anandbarun